बेशक बनारसी उर्फ( dr
s r yadav )
बिना ही सनेह के सनेही बनते हैं लोग ,बिना हित चिंतन हितैषी कहलाते हैं !
धन्य ये शहर धन्य-धन्य शहरातू बन्धु ,कागज के फूल के सरीखे सब नाते हैं!
स्वार्थमयी है प्रीति,रीति नीति कारबार ,निस्वार्थ बेशक किसी को नहीं पाते हैं !
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